(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

सभापर्व ~ महाभारत | Mahabharat Sabha Parv In Hindi


॥ श्रीः ॥
2.30. अध्यायः 030
Mahabharata - Sabha Parva - Chapter Topics
भीमेन प्राचीदिग्विजये पाञ्चालदेशगमनम्॥
Mahabharata - Sabha Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच।

एतस्मिन्नेव काले तु भीमसेनोऽपि वीर्यवान्।
धर्मराजमनुज्ञाप्य ययौ प्राचीं दिशं प्रति॥ 5 2-30-1(12560)
महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना।
हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान्। 2-30-2(12561)
वृतो भरतशार्दूलो द्विषच्छोकविवर्धनः।
स गत्वा नरशार्दूलः पञ्चालानां पुरं महत्॥ 2-30-3(12562)
पञ्चालान्विविधोपायैः सान्त्वयामास पाण्डवः।
`किञ्चित्करं समादाय विदेहानां पुरं ययौ'॥
ततः स गण्डकाञ्शूरो विदेहान्भरतर्षभः॥ 2-30-4(12563)
विजित्याल्पेन कालेन दशार्णानजयत्प्रभुः।
तत्र दाशार्णको राजा सुधर्मा रोमहर्षणम्।
कृतवान्भीमसेनेम महद्युद्धं निरायुधम्। 2-30-5(12564)
भीमसेनस्तु तद्दृष्ट्वा तस्य कर्म महात्मनः।
अधिसेनापतिं चक्रे सुधर्माणं महाबलम्॥ 2-30-6(12565)
ततः प्राचीं दिशं भीमो ययौ भीमपराक्रमः।
सैन्येन महता राजन्कम्पयन्निव मेदिनीम्॥ 2-30-7(12566)
सोऽश्वमेधेश्वरं राजन्रोचमानं सहानुगम्।
जिगाय समरे वीरो बलेन बलिनां वरः॥ 2-30-8(12567)
स तं निर्जित्य कौन्तेयो नातितीव्रेण कर्मणा।
पूर्वदेशं महावीर्यं विजिग्ये कुरनन्दनः॥ 2-30-9(12568)
ततो दक्षिणमागम्य पुलिन्दनगरं महत्।
सुकुमारं वशे चक्रे सुमित्रं च नराधिपम्॥ 2-30-10(12569)
ततस्तु धर्मराजस्य शासनाद्भरतर्षभः।
शिशुपालं महावीर्यमभ्यगाज्जनमेजय॥ 2-30-11(12570)
चेदिराजोऽपि तच्छ्रुत्वा पाण्डवस्य चिकीर्षितम्।
उपनिष्कम्य नगरात्प्रत्यगृह्णात्परन्तप॥ 2-30-12(12571)
तौ समेत्य महाराज कुरुचेदिवृषौ तदा।
उभयोरात्मकुलयोः कौशलं पर्यपृच्छताम्॥ 2-30-13(12572)
ततो निवेद्य तद्राष्ट्रं चेदिराजो विशाम्पते।
उवाच भीमं प्रहसन्किमिदं कुरुषेऽनघ। 2-30-14(12573)
तस्य भीमस्तदाचख्यौ धर्मराजचिकीर्षितम्।
स च तं प्रतिगृह्यैव तथा चक्रे नराधिपः॥ 2-30-15(12574)
ततो भीमस्तत्र राजन्निषित्वा त्रिदशाः क्षपाः।
सत्कृतः शिशुपालेन ययौ सबलवाहनः॥ ॥ 2-30-16(12575)

इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि त्रिंशोऽध्यायः॥ 30॥


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